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श्लोक 12.196.3  |
जापकानां फलावाप्तिं श्रोतुमिच्छामि भारत।
किं फलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापका:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करने वालों को किस प्रकार फल मिलता है? जप करने वालों ने जप का क्या फल बताया है, अथवा जप करने वाले पुरुष किन लोकों में स्थान पाते हैं?॥3॥ |
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| Bharatanandan! Now I wish to hear how those who chant get the fruits? What is the fruit of chanting told by those who chant or in which worlds do the men who chant get a place?॥ 3॥ |
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