श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 195: ध्यानयोगका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.195.14 
अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रिरमत्सरी।
समादध्यात् पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
ध्यानयोग को जानने वाले साधक को चाहिए कि ऐसे विक्षेपों के समय पश्चाताप या व्यथा का अनुभव न करे; अपितु आलस्य और आसक्ति को त्याग दे और ध्यान के द्वारा पुनः अपने मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करे ॥14॥
 
A seeker who knows Dhyanayoga should not experience regret or distress during such distractions; But give up laziness and attachment and try to concentrate your mind again through meditation. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)