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mahabharat 12.194.7: जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाकर फिर समेट लेता है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा परमेश्वर अपने द्वारा रचे गए सम्पूर्ण प्राणियों को फैलाकर फिर समेट लेता है। ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.194.7 
प्रसार्य च यथाङ्गानि कूर्म: संहरते पुन:।
तद्वद् भूतानि भूतात्मा सृष्टानि हरते पुन:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाकर फिर समेट लेता है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा परमेश्वर अपने द्वारा रचे गए सम्पूर्ण प्राणियों को फैलाकर फिर समेट लेता है। ॥7॥
 
Just as a tortoise stretches out its limbs and then retracts them again, similarly the Supreme God, the Soul of all beings, stretches out all beings created by Him and then retracts them within Himself. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)