श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.194.54 
महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा।
न तु तप्यति तत्त्वज्ञ: फले ज्ञाते तरत्युत॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य विशाल नदी के उस पार को जानता है, वह केवल उसे जानकर ही संतुष्ट नहीं होता; जब तक वह नाव आदि द्वारा वहाँ नहीं पहुँच जाता, तब तक वह चिन्ता से व्याकुल रहता है। किन्तु जो सत्य को जानता है, वह केवल ज्ञान से ही संसार सागर को पार कर जाता है; उसे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि यह ज्ञान ही सेतु के समान है ॥ 54॥
 
A man who knows the other side of a mighty river is not satisfied merely by knowing it; until he reaches there by boat etc., he remains troubled with worry. But a man who knows the truth crosses the ocean of the world merely by knowledge; he does not have to worry. Because this knowledge itself is like a bridge. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)