vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण
»
श्लोक 34
श्लोक
12.194.34
प्रहर्ष: प्रीतिरानन्द: सुखं संशान्तचित्तता।
कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणा:॥ ३४॥
अनुवाद
जब मन किसी भी प्रकार से अत्यंत आनंद, प्रेम, प्रसन्नता, सुख और शांति का अनुभव कर रहा हो, तब इन गुणों को सात्त्विक समझना चाहिए ॥34॥
When the mind is experiencing extreme joy, love, happiness, happiness and peace in any way, then these qualities should be considered as Sattvik. 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×