श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.194.34 
प्रहर्ष: प्रीतिरानन्द: सुखं संशान्तचित्तता।
कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणा:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जब मन किसी भी प्रकार से अत्यंत आनंद, प्रेम, प्रसन्नता, सुख और शांति का अनुभव कर रहा हो, तब इन गुणों को सात्त्विक समझना चाहिए ॥34॥
 
When the mind is experiencing extreme joy, love, happiness, happiness and peace in any way, then these qualities should be considered as Sattvik. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)