श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.192.6 
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं
शुचि: सुसंकल्पितमुक्तबुद्धि:।
अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं
स ब्रह्मलोकं श्रयते मनुष्य:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपनी बुद्धि को सब प्रकार के विचारों से रहित करके शुद्ध करता है और नियत विधि के अनुसार मोक्ष (संन्यास) के नियमों का पालन करता है, वह परम शान्त और प्रकाशमान ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, जो ईंधन रहित अग्नि के समान है ॥6॥
 
He who purifies his intellect by making it free from all kinds of thoughts and follows the rules of salvation (renunciation) in accordance with the prescribed method, attains the most peaceful and luminous Brahmaloka, which is like a fire without fuel. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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