श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.192.5 
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं
शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति।
विप्रस्तु भैक्ष्यौपगतैर्हविर्भि-
श्चिताग्निनां स व्रजते हि लोकम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण अपने शरीर में अग्निहोत्र लगाता है और शरीर की अग्नि को जलाने के उद्देश्य से मुख में भिक्षा रूपी हविष्य रखता है, वह अग्नि-वंचित अग्निहोत्रियों के लोक में जाता है॥5॥
 
The Brahmin who applies Agnihotra to his body and offers havishya in the form of alms in his mouth for the purpose of burning the body's fire, goes to the world of fire-choosing Agnihotris. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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