श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.192.23 
अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विता:।
इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो लोग लोभ और मोह से भरे हुए हैं तथा एक-दूसरे को खाने के लिए तत्पर रहते हैं, वे भी इस लोक में आते-जाते रहते हैं और उत्तर दिशा में स्थित श्रेष्ठ लोक में नहीं जा पाते।
 
Those who are filled with greed and attachment and are ready to devour one another, they too keep coming and going within this world and are unable to go to the superior world in the northern direction.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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