श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.192.2 
यस्त्वेतां नियतश्चर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत्
स दहेदग्निवद्दोषान् जयेल्लोकांश्च दुर्जयान्॥ २॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य ब्रह्मर्षियों द्वारा बताए गए वानप्रस्थ धर्म के नियमों का पालन करता है, वह अग्नि के समान अपने दोषों को जलाकर दुर्लभ लोकों को प्राप्त करता है। ॥2॥
 
A man who abides by the rules and practices the rules of the Vanaprastha Dharma laid down by the Brahmarishis, burns his faults like fire and attains the rare worlds. ॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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