श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.192.19 
इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मण:।
कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम्।
शुभै: शुभमवाप्नोति तथाशुभमथान्यथा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में अच्छे और बुरे कर्मों के विषय में अनेक प्रकार के विचार होते हैं। यह कर्मभूमि है। इस संसार में अच्छे और बुरे कर्म करने से मनुष्य अच्छे कर्मों का अच्छा फल पाता है और बुरे कर्मों का बुरा फल भोगता है।॥19॥
 
In this world, there are many types of thoughts about good and bad deeds. This is the land of action. By doing good and bad deeds in this world, a man gets good results of good deeds and suffers bad results of bad deeds.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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