| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार » श्लोक 17-18 |
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| | | | श्लोक 12.192.17-18  | सोपधं निकृति: स्तेयं परीवादो ह्यसूयिता।
परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा॥ १७॥
एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते।
यस्त्वेतान् नाचरेद् विद्वांस्तपस्तस्य प्रवर्धते॥ १८॥ | | | | | | अनुवाद | | छल, कपट, बेईमानी, चोरी, निन्दा, दूसरों के दोष देखना, दूसरों को कष्ट पहुँचाना, प्राणियों की हत्या, चुगली और झूठ बोलना - जो इन दुर्गुणों में लिप्त रहता है, उसका तप क्षीण हो जाता है। और जो विद्वान् पुरुष इन दुर्गुणों में कभी लिप्त नहीं होता, उसका तप निरन्तर बढ़ता रहता है। ॥17-18॥ | | | | Deceit, dishonesty, theft, slander, finding faults in others, harming others, killing living beings, backbiting and lying - the one who indulges in these vices, his penance weakens. And the learned man who never indulges in these vices, his penance continues to increase. ॥17-18॥ | | ✨ ai-generated | | |
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