श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.192.16 
इह वार्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कारिण:।
यस्तद्वेदोभयं प्राज्ञ: पाप्मना न स लिप्यते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इस देश में धर्म-अधर्म करने वालों के विषय में नाना प्रकार की बातें सुनने को मिलती हैं। जो विद्वान् मनुष्य धर्म-अधर्म दोनों के फल को जानता है, वह पाप नहीं करता। 16॥
 
In this country, various kinds of things are heard about people doing righteousness and unrighteousness. A learned man who knows the consequences of both righteousness and unrighteousness does not indulge in sin. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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