श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 192: वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  12.192.12-13 
कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते।
पानासनाशनोपेता: प्रासादभवनाश्रया:॥ १२॥
सर्वकामैर्वृता: केचिद्धेमाभरणभूषिता:।
प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते।
श्रमेण महता केचित् कुर्वन्ति प्राणधारणम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वहाँ किए हुए कर्मों का फल प्रत्यक्ष मिलता है। उस लोक में कुछ लोग बड़े-बड़े महलों में रहते हैं, अच्छे आसनों पर बैठते हैं और उत्तम-उत्तम वस्तुएँ खाते-पीते हैं। उनकी सारी कामनाएँ पूरी हो जाती हैं और वे स्वर्ण-आभूषणों से विभूषित होते हैं। कुछ लोग केवल जीवन निर्वाह के लिए ही भोजन प्राप्त करते हैं, कुछ लोग बड़े प्रयत्नपूर्वक तपश्चर्या करके जीवन धारण करते हैं (इस प्रकार वह लोक इस लोक से सर्वथा श्रेष्ठ है)॥12-13॥
 
The fruits of the deeds done there are directly available. In that world some people live in big palaces, sit on good seats and eat and drink the best things. All the desires are fulfilled and they are adorned with golden ornaments and some people get food only to sustain life, some people spend a life of penance with great effort and hold on to life (thus that world is completely superior to this world)*॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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