श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.191.2 
भृगुरुवाच
हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्यायै: शान्तिरुत्तमा।
दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भृगु जी बोले - ऋषिवर! अग्निहोत्र से पाप नष्ट होते हैं, स्वाध्याय से महान शांति प्राप्त होती है, दान से सुख प्राप्त होते हैं और तप से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है॥ 2॥
 
Bhrigu Ji said - Sage! Sins are eradicated by Agnihotra, great peace is obtained by self-study, pleasures are attained by charity and by austerity a man attains heaven.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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