श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.191.17 
त्रिवर्गगुणनिर्वृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे।
स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य गृहस्थ जीवन में सदैव धर्म, अर्थ और काम रूपी गुणों को प्राप्त करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अन्त में पुण्य लोक को प्राप्त होता है ॥17॥
 
The man who always attains the virtues of Dharma, Artha and Kama in the household life, after experiencing happiness in this world, finally attains the path of virtuous people. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)