श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.191.14 
श्लोकौ चात्र भवत:—
वात्सल्यात्सर्वभूतेभ्यो वाच्या: श्रोत्रसुखा गिर:।
परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इस विषय में ये दो श्लोक प्रसिद्ध हैं - जो वचन सब प्राणियों के प्रति प्रेम से युक्त हों और कानों को मधुर लगें, ऐसे बोलने चाहिए। दूसरों को कष्ट देना, मारना और कटु वचन बोलना, ये सब निन्दनीय कर्म हैं॥14॥
 
These two verses are famous in this regard - One should speak such words which are full of love for all beings and which sound pleasant to the ears. Hurting others, beating them and speaking harsh words to them are all condemnable acts.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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