श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.191.1 
भरद्वाज उवाच
दानस्य किं फलं प्राहुर्धर्मस्य चरितस्य च।
तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य वा॥ १॥
 
 
अनुवाद
भरद्वाज ने पूछा - हे ब्रह्मन्! दान, अच्छी तरह से किये हुए तप, स्वाध्याय और अग्निहोत्ररूपी धर्म का फल क्या कहा गया है?॥1॥
 
Bharadwaj asked – Brahmin! What has been said to be the result of the dharma practiced in the form of charity, well-done penance, self-study and Agnihotra? 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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