भृगुरुवाच
न पञ्चसाधारणमत्र किंचि-
च्छरीरमेको वहतेऽन्तरात्मा।
स वेत्ति गन्धांश्च रसान् श्रुतीश्च
स्पर्शं च रूपं च गुणांश्च येऽन्ये॥ १९॥
अनुवाद
भृगुजी बोले - मुनि ! मन भी पंचभूतों से बना है, अतः वह पंचभूतों से भिन्न कोई अन्य तत्त्व नहीं है। अन्तरात्मा ही इस शरीर का भार वहन करती है, वही रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द आदि गुणों का अनुभव करती है॥19॥
Bhriguji said - Muni! Mind is also made up of five elements; hence it is not any other element apart from the five elements. The inner soul alone bears the burden of this body, it experiences form, taste, smell, touch, sound and other qualities.॥19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥