श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 185: शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.185.9 
धातुष्वग्निस्तु वितत: समानेन समीरित:।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन्नवतिष्ठते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
शरीर की समस्त धातुओं में व्याप्त अग्नि उसी वायु से संचालित होती है। वही वायु सम्पूर्ण शरीर में स्थित होकर शरीर के रसों, धातुओं (इन्द्रियों) और दोषों (कफ आदि) को नियंत्रित करती है।॥9॥
 
The fire that pervades all the body's metals is driven by the same air. The same air is situated in the entire body, controlling the body's juices, metals (senses) and defects (phlegm etc.).॥ 9॥
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