श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 185: शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.185.2 
भृगुरुवाच
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन् कथयिष्यामि तेऽनघ।
प्राणिनामनिलो देहान् यथा चेष्टयते बली॥ २॥
 
 
अनुवाद
भृगुन बोले - ब्रह्मन्! हे निष्पाप महर्षि! मैं तुम्हें वायु की गति का वर्णन करता हूँ। प्रचण्ड वायु किस प्रकार जीवों के शरीरों को क्रियाशील बनाती है? मैं तुम्हें यह बताता हूँ। 2॥
 
Bhrigun said – Brahman! Sinless Maharishi! Let me describe to you the dynamics of air. How does strong wind make the bodies of living beings active? Let me tell you this. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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