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श्लोक 12.185.17  |
एवं सर्वेषु विहित: प्राणापानेषु देहिनाम्।
तस्मिन् समिध्यते नित्यमग्नि: स्थाल्यामिवाहित:॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| प्राणियों के प्राण, अपान आदि समस्त गैसों में स्थापित जठराग्नि शरीर में स्थित रहती है और हवन-पात्र में रखी हुई अग्नि की भाँति सदैव जलती रहती है ॥17॥ |
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| The gastric fire established in all the gases like prana, apan etc. of living beings remains in the body and always keeps burning like the fire kept in a fire-pot. 17॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८५॥
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