श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 185: शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.185.16 
एष मार्गोऽथ योगानां येन गच्छन्ति तत्पदम्।
जितक्लमा: समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधन्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मुख से गुदा तक का यह महान स्रोत योगियों का मार्ग है। इसके द्वारा वे योगीजन, जिन्होंने समस्त क्लेशों को जीत लिया है, जो सर्वत्र समभाव और धैर्य रखते हैं, तथा वे महात्माजन, जो सुषुम्ना नाड़ी द्वारा सिर तक पहुँचकर वहाँ स्थित हो गए हैं, परम गति को प्राप्त होते हैं॥ 16॥
 
This great source from the mouth to the anus is the path of the Yogis. Through this, those Yogis, who have conquered all the afflictions, who are equanimous and patient everywhere, and those great souls, who have reached the head through the Sushumna Nadi and have established themselves there, attain the supreme state.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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