श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 185: शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.185.13 
अग्निवेगवह: प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते।
स ऊर्ध्वमागम्य पुन: समुत्क्षिपति पावकम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
अग्नि के बल से प्रवाहित प्राणशक्ति गुदाद्वार के पास रुक जाती है; फिर ऊपर की ओर लौटकर समीपस्थ अग्नि को भी ऊपर उठाती है ॥13॥
 
The life force flowing with the force of fire gets halted near the anus; then returning upwards it raises the nearby fire as well. ॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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