श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 185: शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.185.10 
अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमाहित:।
समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावक:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अपान और प्राण के मध्य (नाभि) में स्थित जठराग्नि प्राण और अपान दोनों का आश्रय लेकर खाए हुए अन्न को भलीभाँति पचाती है ॥10॥
 
The gastric fire, situated in the middle of the Apana and Prana (navel) taking shelter of both Prana and Apana, digests the food eaten very well. ॥10॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas