श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 185: शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.185.1 
भरद्वाज उवाच
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्नि: कथं प्रभो।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिल:॥ १॥
 
 
अनुवाद
भारद्वाज ने पूछा - हे प्रभु! शरीर के भीतर स्थित अग्नि किस प्रकार पृथ्वीतत्त्व (पंचभूतों) में स्थित रहती है और वायु भी उसी पृथ्वीतत्त्व का आश्रय लेकर किस प्रकार एक विशेष स्थान के माध्यम से शरीर को क्रियाशील बनाती है?॥1॥
 
Bharadwaj asked - Lord! How does the fire that resides within the body stay in the earthly element (five elements) and how does the air, also taking shelter of the same earthly element, make the body active through a special space?॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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