श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 184: पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.184.5 
इत्येतै: पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावरजङ्गमम्।
श्रोत्रं घ्राणं रस: स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रियसंज्ञिता:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत इन पाँच भूतों से युक्त है। ये सूक्ष्म अंग पाँच इन्द्रियाँ कहलाते हैं - श्रोत्र (कान), घ्राण (नासिका), रसना (स्राव), त्वचा और नेत्र। 5॥
 
In this way the entire movable and immovable world is comprised of these five ghosts. These subtle parts are known as the five senses – Shrotra (ear), Ghrana (nostril), Rasna (secretion), skin and eyes. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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