| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 184: पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन » श्लोक 38-40h |
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| | | | श्लोक 12.184.38-40h  | तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम्।
तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरं विविधात्मकम्॥ ३८॥
षड्ज ऋषभगान्धारौ मध्यमो धैवतस्तथा।
पञ्चमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान्॥ ३९॥
एष सप्तविध: प्रोक्तो गुण आकाशसम्भव:। | | | | | | अनुवाद | | आकाश का एकमात्र गुण शब्द माना गया है। उस शब्दगुण का विस्तार मैं अनेक प्रकार से बताता हूँ - षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद - ये आकाशजनित शब्दगुण के सात प्रकार हैं, जिन्हें जानना चाहिए। 38-39 1/2॥ | | | | The only quality of the sky is considered to be word. Let me describe the expansion of that Shabdgun in various types - Shadja, Rishabh, Gandhar, Madhyam, Pancham, Dhaivat and Nishad - these are the seven types of Akash-born Shabdgun, which should be known. 38-39 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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