श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 184: पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 33-35h
 
 
श्लोक  12.184.33-35h 
ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान्॥ ३३॥
शुक्ल: कृष्णस्तथा रक्त: पीतो नीलारुणस्तथा।
कठिनश्चिक्कण: श्लक्ष्ण: पिच्छिलो मृदुदारुण:॥ ३४॥
एवं षोडशविस्तारो ज्योतीरूपगुण: स्मृत:।
 
 
अनुवाद
छोटा, लंबा, मोटा, सब ओर से चौकोर और गोल, श्वेत, काला, लाल, पीला और आकाश-नीला, कठोर, चिकना, छोटा, चिपचिपा, कोमल और भयंकर - इस प्रकार ज्योतिर्मय रूप नामक गुण सोलह भेदों में विस्तृत हो गया है ॥33-34 1/2॥
 
Short, long, thick, square and round from all sides, white, black, red, yellow and sky-blue, hard, smooth, little, sticky, soft and fierce – in this manner the quality called luminous form has expanded into sixteen varieties. ॥33-34 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd