श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 184: पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  12.184.24-25 
प्राणात् प्रणीयते प्राणी व्यानाद् व्यायच्छते तथा।
गच्छत्यपानोऽधश्चैव समानो हृद्यवस्थित:॥ २४॥
उदानादुच्छ्वसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते।
इत्येते वायव: पञ्च चेष्टयन्तीह देहिनम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
प्राण के द्वारा जीव गति करता है, व्यान के द्वारा व्यायाम करता है, अपान वायु ऊपर से नीचे की ओर चलती है, समान वायु हृदय में स्थित है, उदान के द्वारा मनुष्य श्वास लेता है और कण्ठ, तालु आदि स्थानों से शब्दों और अक्षरों का उच्चारण करता है। इस प्रकार ये पाँच वायुओं के परिणाम हैं, जो शरीर को क्रियाशील बनाती हैं। 24-25॥
 
Through Prana, a living being works to move, through Vyana it performs exercise (forceful endeavours), Apana Vayu moves from top to bottom, Samana Vayu is situated in the heart, through Udana the man inhales and pronounces words and syllables from different places like throat, palate etc. Thus, these are the results of the five winds, which make the body active. 24-25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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