श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक d1h-11
 
 
श्लोक  12.182.d1h-11 
भृगुरुवाच
(नारायणो जगन्मूर्तिरन्तरात्मा सनातन:।
कूटस्थोऽक्षर अव्यक्तो निर्लेपो व्यापक: प्रभु:
प्रकृते: परतो नित्यमिन्द्रियैरप्यगोचर:।
स सिसृक्षु: सहस्रांशादसृजत् पुरुषं प्रभु:।)
मानसो नाम विख्यात: श्रुतपूर्वो महर्षिभि:।
अनादिनिधनो देवस्तथाभेद्योऽजरामर:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
भृगु बोले - ब्रह्मन्! भगवान नारायण सम्पूर्ण जगत् के स्वरूप हैं। वे सबके अन्तर्यामी और सनातन पुरुष हैं। वे कूटस्थ, अविनाशी, अव्यक्त, अवर्णनीय, सर्वव्यापी, प्रकृति से परे और इन्द्रियों से परे प्रभु हैं। जब भगवान नारायण के हृदय में सृष्टि का विचार उत्पन्न हुआ, तब उन्होंने अपने हजारवें अंश से एक पुरुष की रचना की, जिसे सर्वप्रथम महर्षियों ने इसी नाम से सुना, जो मानसपुरुष के नाम से प्रसिद्ध है। वह मानसदेव पूर्वजन्म में उत्पन्न होकर अनादि, नित्य, अभेद्य, अमर और अमर है। 11॥
 
Bhrigu said – Brahman! Lord Narayana is the embodiment of the entire world. He is everyone's inner soul and eternal man. He is the Kutastha, indestructible, unmanifested, inexpressible, omnipresent, Lord, beyond nature and beyond the senses. When the thought of creation arose in the heart of Lord Narayana, he created a man from his thousandth part, who was first heard by the Maharishis by this name, who is famous by the name of Manaspurush. That Manasdev, born in the past, is eternal, eternal, impenetrable, immortal and immortal. 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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