श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.182.4 
कीदृशो जीवतां जीव: क्व वा गच्छन्ति ये मृता:।
अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु नो भवान्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जीवात्मा की आत्मा कैसी होती है? जो लोग मर जाते हैं वे कहाँ जाते हैं? इस लोक से दूसरे लोक में जाने का क्रम क्या है? कृपया हमें ये सब बताएँ।
 
What is the soul of a living being like? Where do those who have died go? What is the order of going from this world to the other? Please tell us all these things.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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