श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.182.37 
भृगुरुवाच
मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता।
तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
भृगुन बोले - मुने ! मानसदेव का जो स्वरूप बताया गया है, वह ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुआ है। ब्रह्माजी के आसन के कारण ही यह पृथ्वी पद्म (कमल) कही गई है ॥37॥
 
Bhrigun said – Mune! The form of Manasdev that has been described is manifested in the form of Brahma. This earth itself is called Padma (Lotus) for the seat of Lord Brahma. 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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