श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.182.35 
तत: पुष्करत: सृष्ट: सर्वज्ञो मूर्तिमान् प्रभु:।
ब्रह्मा धर्ममय: पूर्व: प्रजापतिरनुत्तम:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् पूर्वोक्त कमलसे सर्वज्ञ, मूर्तिरूप, प्रभावशाली, परम कल्याणकारी तथा प्रथम प्रजापति धर्मात्मा ब्रह्माजी प्रकट हुए ॥35॥
 
Thereafter, from the aforesaid lotus, the omniscient, idol-like, influential, supremely good and the first Prajapati, the righteous Brahma emerged. 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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