Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.182.34: जब परमात्मा का वह दिव्य रूप अपनी माया के कारण कभी बहुत छोटा और कभी बहुत बड़ा हो जाता है, तब उनके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उस रूप के वास्तविक विस्तार को जान सके अर्थात् उनके समान कोई नहीं है ॥ 34॥ | mahabharat अध्याय 12.182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जब परमात्मा का वह दिव्य रूप अपनी माया के कारण कभी बहुत छोटा और कभी बहुत बड़ा हो जाता है, तब उनके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उस रूप के वास्तविक विस्तार को जान सके अर्थात् उनके समान कोई नहीं है ॥ 34॥
When that divine form of the Supreme Being sometimes becomes very small and sometimes very big due to His Maya, then who other than Him is as talented as Him who can know the true extent of that form i.e. there is no one like Him. ॥ 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥