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श्लोक 12.182.34  |
यदा तु दिव्यं तद् रूपं ह्रसते वर्धते पुन:।
कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्तो योऽपि स्यात् तद्विधोऽपर:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| जब परमात्मा का वह दिव्य रूप अपनी माया के कारण कभी बहुत छोटा और कभी बहुत बड़ा हो जाता है, तब उनके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उस रूप के वास्तविक विस्तार को जान सके अर्थात् उनके समान कोई नहीं है ॥ 34॥ |
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| When that divine form of the Supreme Being sometimes becomes very small and sometimes very big due to His Maya, then who other than Him is as talented as Him who can know the true extent of that form i.e. there is no one like Him. ॥ 34॥ |
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