श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.182.33 
तदा गौणमनन्तस्य नामानन्तेति विश्रुतम्।
नामधेयानुरूपस्य मानसस्य महात्मन:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
अतः परब्रह्म मानसदेव अपने नाम के अनुसार अनंत हैं। उनके गुणों के अनुसार ही उनका सुविख्यात नाम अनंत है ॥33॥
 
Therefore, the Supreme Being Manasdev is infinite as per his name. His well-known name Anant is in accordance with his qualities. ॥ 33॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas