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mahabharat 12.182.29: इस प्रकार देवताओं के लिए भी ईश्वर, आकाश, जल, अग्नि और वायु का अन्त और विस्तार जानना अत्यन्त कठिन है ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.182.29 
एवमन्तं भगवत: प्रमाणं सलिलस्य च।
अग्निमारुततोयेभ्यो दुर्ज्ञेयं दैवतैरपि॥ २९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार देवताओं के लिए भी ईश्वर, आकाश, जल, अग्नि और वायु का अन्त और विस्तार जानना अत्यन्त कठिन है ॥29॥
 
In this way, it is very difficult even for the gods to know the end and extent of God, sky, water, fire and air. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)