श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.182.26 
उपरिष्टोपरिष्टात्तु प्रज्वलद्भि: स्वयंप्रभै:।
निरुद्धमेतदाकाशमप्रमेयं सुरैरपि॥ २६॥
 
 
अनुवाद
यह अथाह आकाश भी ऊपर चमकते हुए स्वयंप्रकाशमान देवताओं से भरा हुआ प्रतीत होता है ॥26॥
 
Even this immeasurable sky seems to be filled with the self-illuminating deities shining overhead. ॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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