श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.182.25 
ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभस: प्रथितौजस:।
दुर्गमत्वादनन्तत्वादिति मे विद्धि मानद॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे माननीय! परंतु वे महान तारारूपी देवता भी इस आकाश का अंत नहीं देख सकते; क्योंकि यह दुर्गम और अनंत है; इसे आप मुझसे सुनकर अच्छी तरह समझ लीजिए॥ 25॥
 
Honorable! But even those illustrious star-like deities cannot see the end of this sky; because it is inaccessible and endless; you should understand this well after hearing it from me. ॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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