श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.182.23 
भृगुरुवाच
अनन्तमेतदाकाशं सिद्धदैवतसेवितम्।
रम्यं नानाश्रयाकीर्णं यस्यान्तो नाधिगम्यते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भृगुजी बोले- मुनि! यह आकाश अनन्त है, इसमें अनेक सिद्ध और देवता निवास करते हैं। उनके भिन्न-भिन्न लोक भी इसी में स्थित हैं। यह अत्यन्त सुन्दर और इतना विशाल है कि इसका अन्त कहीं नहीं मिलता॥ 23॥
 
Bhriguji said- Muni! This sky is endless, many Siddhas and Gods reside in it. Their different worlds are also situated in it. It is very beautiful and so vast that its end is nowhere to be found.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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