श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 180: सद्‍बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.180.7 
तथा मुमूर्षुमासीनमकूजन्तमचेतसम्।
इन्द्र: शृगालरूपेण बभाषे लुब्धमानसम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उसे इस प्रकार मरने की इच्छा से बैठा हुआ, अचेत, कुछ न बोलता हुआ तथा मन में धन के मोह से ग्रस्त देखकर भगवान इन्द्र सियार का रूप धारण करके आए और उससे इस प्रकार कहने लगे-॥7॥
 
Seeing him sitting like this with the desire to die, unconscious and not saying anything and tempted for money in his mind, Lord Indra came in the form of a jackal and started speaking to him thus -॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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