श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 180: सद्‍बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.180.40 
यदि ब्राह्मण देहस्ते निरातङ्को निरामय:।
अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृत:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणदेव! यदि आपका शरीर निर्भय और रोगरहित है, आपके सभी अंग ठीक हैं, तथा उनमें किसी में भी विकार नहीं है, तो संसार में कोई भी आपकी निन्दा नहीं कर सकता - आप निन्दा के योग्य नहीं हो सकते॥40॥
 
'Brahmindev! If your body is fearless and disease-free, all your organs are fine, and there is no disorder in any of them, then no one in the world can reproach you - you cannot be worthy of reproach.॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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