श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 180: सद्‍बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.180.13 
अपाणित्वाद् वयं ब्रह्मन् कण्टकं नोद्धरामहे।
जन्तूनुच्चावचानङ्गे दशतो न कषाम वा॥ १३॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्म! हमारे शरीर में काँटे गड़ जाते हैं; परन्तु हाथ न होने के कारण हम उन्हें निकाल नहीं पाते। यहाँ तक कि हमारे शरीर को काटने वाले छोटे-बड़े जीवों को भी हम निकाल नहीं पाते॥13॥
 
‘Brahman! Thorns get stuck in our body; but since we don't have hands, we are unable to remove them. We cannot even remove the small and big creatures that bite our body.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)