श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 180: सद्‍बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.180.10 
सर्वे लाभा: साभिमाना इति सत्यवती श्रुति:।
संतोषणीयरूपोऽसि लोभाद् यदभिमन्यसे॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘संसार में जितने भी लाभ हैं, वे सब अभिमान से युक्त हैं, यही श्रुतिका का कथन है जो यथार्थ अर्थ बताता है (अर्थात् मैंने अपने ही प्रयत्नों से यह लाभ प्राप्त किया है, प्रायः सभी मनुष्यों में इस प्रकार का अभिमान होता है)। तुम्हारा स्वभाव संतोष करने योग्य है। तुम केवल लोभ के कारण ही उसकी उपेक्षा करते हो॥10॥
 
‘All the benefits in the world are full of pride, this is the statement of Shrutika which explains the true meaning (i.e. I have achieved this benefit by my own efforts, almost all men have this kind of pride). Your nature is worthy of being content. You ignore it only due to greed.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)