श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 18: अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  12.18.38-39 
एवं धर्ममनुक्रान्ता: सदा दानतप:परा:।
आनृशंस्यगुणोपेता: कामक्रोधविवर्जिता:॥ ३८॥
प्रजानां पालने युक्ता दानमुत्तममास्थिता:।
इष्टाँल्लोकानवाप्स्यामो गुरुवृद्धोपचायिन:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
यदि हम इस प्रकार धर्म के मार्ग पर चलते हुए दान और तप में सदैव तत्पर रहें, दया आदि गुणों से युक्त रहें, काम और क्रोध आदि दोषों का त्याग करें, उत्तम दान और धर्म का आश्रय लें, लोक-कल्याण में तत्पर रहें तथा अपने बड़ों और गुरुजनों की सेवा करें, तो हमें इच्छित लोक की प्राप्ति होगी॥ 38-39॥
 
If we follow the path of Dharma in this way, being always ready for charity and austerity, being endowed with virtues like compassion, giving up vices like lust and anger, taking recourse to the best charity and Dharma, being engaged in the welfare of the people and serving our elders and teachers, we shall attain the world we desire.॥ 38-39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)