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mahabharat 12.18.25: जो व्यक्ति सदैव याचक या अहंकारी रहता है, उसे दी गई दक्षिणा जंगल की आग में दी गई आहुति के समान व्यर्थ है।   |   mahabharat अध्याय 12.18: अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.18.25 
सदैव याचमानेषु तथा दम्भान्वितेषु च।
एतेषु दक्षिणा दत्ता दावाग्नाविव दुर्हुतम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति सदैव याचक या अहंकारी रहता है, उसे दी गई दक्षिणा जंगल की आग में दी गई आहुति के समान व्यर्थ है।
 
'Dakshina given to a person who is always begging or conceited is as useless as an oblation given in a forest fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)