श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 18: अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.18.14 
तांश्च त्वं विफलान् कुर्वन् कं नु लोकं गमिष्यसि।
राजन् संशयिते मोक्षे परतन्त्रेषु देहिषु॥ १४॥
 
 
अनुवाद
राजन! मोक्ष प्राप्ति संदिग्ध है और जीव प्रारब्ध के अधीन हैं। ऐसी स्थिति में यदि आप उन स्वार्थी सेवकों को असफल होने की इच्छा करेंगे, तो कौन जाने वे किस लोक में जाएँगे? 14॥
 
'King! Attainment of salvation is doubtful and creatures are subject to destiny. In such a situation, if you wish those selfish servants to fail, then who knows which world they will go to? 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)