श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.179.36 
तदिदमनुनिशम्य विप्रपातं
पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यै:।
अनवसितमनन्तदोषपारं
नृषु विहरामि विनीतदोषतृष्ण:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
इस अजगर-समान आचरण के विषय में सुनकर मूर्ख लोग इसे पर्वत शिखर से गिरने के समान भयंकर समझते हैं। किन्तु उनका मत भिन्न है। मैं इस अजगर-समान आचरण को अज्ञान का नाश करने वाला और समस्त दोषों से रहित मानता हूँ। अतः मैं समस्त दोषों और कामनाओं का परित्याग करके मनुष्यों के बीच विचरण करता हूँ।॥ 36॥
 
‘On hearing about this python-like behaviour, fools consider it to be as dangerous as falling from a mountain peak. But their belief is different. I consider this python-like behaviour to be the destroyer of ignorance and free from all faults. Therefore, I wander among humans, abandoning all faults and desires.’॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)