श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.179.34 
न हृदयमनुरुध्य वाङ्मनो वा
प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च।
तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
मन, वाणी और बुद्धि की उपेक्षा करके मैं पवित्र भाव से इस अजगरव्रत का पालन करता हूँ, जैसे प्रिय विषयों को देखता हूँ - भोगों की दुर्लभता और अनित्यता को देखता हूँ ॥34॥
 
'Disregarding the mind, speech and intellect, I observe this Ajagarvrat with a sacred spirit, as one who sees the subjects that are dear to them - the rarity and impermanence of pleasures.' 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)