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mahabharat 12.179.28: वे 'मुझे यह मिल जाए, मुझे वह मिल जाए' ऐसी कामना से ग्रस्त रहते हैं और धन न मिलने से निरन्तर दुःखी रहते हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा को भली-भाँति देखकर, मैं सत्यज्ञान को प्राप्त होकर, शुद्ध भाव से इस 'अजागरव्रत' का अनुष्ठान करता हूँ॥ 28॥   |   mahabharat अध्याय 12.179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.179.28 
इदमिदमिति तृष्णयाभिभूतं
जनमनवाप्तधनं विषीदमानम्।
निपुणमनुनिशम्य तत्त्वबुद्धॺा
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वे 'मुझे यह मिल जाए, मुझे वह मिल जाए' ऐसी कामना से ग्रस्त रहते हैं और धन न मिलने से निरन्तर दुःखी रहते हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा को भली-भाँति देखकर, मैं सत्यज्ञान को प्राप्त होकर, शुद्ध भाव से इस 'अजागरव्रत' का अनुष्ठान करता हूँ॥ 28॥
 
'They are overcome with desire, 'Let me get this, let me get that', and are constantly sad because they do not get wealth. Having seen the plight of such people well, I, having attained the true wisdom, perform this Aajagaravrata with pure intentions.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)