श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 176: त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.176.7 
अकिंचन: परिपतन् सुखमास्वादयिष्यसि।
अकिंचन: सुखं शेते समुत्तिष्ठति चैव ह॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यदि तू सब कुछ त्याग दे और कुछ भी संग्रह न करे, तो तू सर्वत्र विचरण करता हुआ भी सुख का अनुभव करेगा; क्योंकि जो दरिद्र है - जिसके पास कुछ भी नहीं है - वह सुख से सोता और जागता है ॥7॥
 
If you renounce everything and do not collect anything, you will experience happiness while roaming everywhere; because the one who is poor - the one who has nothing - sleeps and wakes up comfortably. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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